देहरादून/गढ़वाल:
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आज पारंपरिक उल्लास और उमंग के साथ इगास-बग्वाल (जिसे स्थानीय रूप से इगास पर्व कहा जाता है) मनाया गया। पूरे राज्य में ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक लोगों ने लोकगीतों, नृत्यों और पारंपरिक व्यंजनों के साथ इस पर्व का आनंद लिया।
दीपावली के 11 दिन बाद मनाया जाने वाला इगास, देवभूमि की लोक संस्कृति से गहराई से जुड़ा पर्व है। इस दिन लोग गाय-भैंसों की पूजा करते हैं, घरों में दीप जलाते हैं और रातभर ‘ढोल-दमाऊं’ की थाप पर थिरकते हैं। कई जगहों पर युवाओं ने झोड़ा और छपेली जैसे पारंपरिक नृत्यों का आयोजन किया।
गढ़वाल, टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी जिलों में इगास की रौनक देखते ही बन रही थी। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों ने पारंपरिक परिधान पहनकर एक-दूसरे को बधाई दी और ‘इगास बग्वाल की शुभकामनाएं’ दीं। पर्व के अवसर पर पुराणी लोककथाएँ सुनने और स्थानीय पकवान जैसे सिंघल, अरसा, गाठ आदि का आनंद लिया गया।
राजधानी देहरादून सहित हिल स्टेशनों में भी प्रवासी उत्तराखंडियों ने उत्साहपूर्वक इगास मनाया। कई सांस्कृतिक संगठनों ने इस दिन को “अपनी जड़ों से जुड़ने का पर्व” बताया। सोशल मीडिया पर भी ‘#इगास_बग्वाल’ ट्रेंड करता रहा, जहाँ लोगों ने अपनी पारंपरिक झलकियाँ साझा कीं।
राज्य के मुख्यमंत्री ने भी जनता को इगास की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि यह पर्व उत्तराखंड की “लोक संस्कृति और सामूहिक एकता का प्रतीक” है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना हम सबका दायित्व है।

