उत्तर प्रदेश में विद्युत (बिजली) कर्मियों का आंदोलन अब पूरे 302वें दिन में प्रवेश कर चुका है। वे बिजली वितरण प्रणालियों के निजीकरण का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं और 78 दिनों का बोनस देने की मांग कर रहे हैं, जैसा रेलवे कर्मचारियों को मिलता है।
इस प्रदर्शन को विधुत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति चला रही है।
आंदोलन अब 24 जिलों में फैला है — जिनमें कानपुर, नोएडा, वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण जिले शामिल हैं। इन जिलों में प्रदर्शन, मार्च और धरना प्रदर्शन सुर्खियों में रहे हैं।
कर्मियों ने सरकार और UPPCL (उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लिमिटेड) से उनकी मांगों को स्वीकार करने को कहा है।
आंदोलन की मुख्य मांगें
78-दिन का बोनस: बिजलीकर्मी चाहते हैं कि उन्हें रेलवे कर्मचारियों की तरह बोनस मिले।
निजीकरण विरोध: विशेष रूप से पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल वितरण मंडलों को निजी हाथों में सौंपने की संभावना के खिलाफ।
अनुशासनात्मक कार्रवाई वापस लेनी: आंदोलन के दौरान कुछ कर्मियों पर लगाए गए निलंबन या कार्रवाई को रद्द करना।
लोक स्वामित्व बनाए रखना: बिजली वितरण सार्वजनिक क्षेत्र में रहना चाहिए, निजी कंपनियों को जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाए।
मुख्यमंत्री हस्तक्षेप: सरकार को हस्तक्षेप कर समस्या का समाधान करना चाहिए।
सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव & प्रतिक्रियाएँ
यह आंदोलन सिर्फ कर्मचारी-सरकार विवाद ही नहीं है, बल्कि जनता, राजनीति और संसाधन प्रबंधन का संवेदनशील विषय बन गया है।
इस आंदोलन ने मीडिया, राजनैतिक दलों और चुनावी जनमत को प्रभावित किया है।
त्योहारों (जैसे दशहरा, दिवाली) के बीच बिजली संकट और प्रदर्शन की खबरों ने आम जनता में चिंता बढ़ाई है।
राजनीतिक दल इस मुद्दे को चुनावी एजेंडा में जोड़ना शुरू कर चुके हैं।
सरकार पर दबाव है कि यह सार्वजनिक संपत्ति और उपभोक्ता हितों के बीच संतुलन बनाए।
आंदोलन की चुनौतियाँ और गतिशीलता
निजीकरण की योजना बहुत पेचीदा बनने लगी है — अधिकारी और निजी कंपनियाँ समानांतर योजनाएँ बना रही हैं।
हर जिले में प्रदर्शन स्वरूप और तीव्रता अलग हो रही है — कहीं धक्का-मुक्की, कहीं शांत धरना।
पूर्वानुमान है कि यदि मांगों पर कोई समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन और उग्र हो सकता है।
सरकार को यह विचार करना होगा कि बिजली सेवा बाधित न हो और उपभोक्ता प्रभावित न हों।

